अपशिष्ट या कूड़ा-करकट का मतलब है इधर-उधर बिखरे हुए संसाधन। बड़ी संख्या में कार्बनिक पदार्थ कृषि गतिविधियों, डेयरी फार्म और पशुओं से प्राप्त होते हैं जिसे घर के बाहर एक कोने में जमा किया जाता है। जहाँ वह सड़-गल कर दुर्गंध फैलाता है। इस महत्वपूर्ण संसाधन को मूल्य आधारित तैयार माल के रूप में अर्थात् खाद के रूप में परिवर्तित कर उपयोग में लाया जा सकता है। कार्बनिक अपशिष्ट का खाद के रूप में परिवर्तन का मुख्य उद्देश्य केवल ठोस अपशिष्ट का निपटान करना ही नहीं अपितु एक उत्तम कोटि का खाद भी तैयार करना है जो हमारे खेत को उचित पोषक तत्व प्रदान करें।
कृमि खाद में स्थानीय प्रकार के केंचुओं का प्रयोग किया जाता है –
दुनियाभर में केंचुओं की लगभग 2500 प्रजातियों की पहचान की गई है जिसमें से केंचुओं की पाँच सौ से अधिक प्रजाति भारत में पाई जाती है। विभिन्न प्रकार की मिट्टी में भिन्न-भिन्न प्रकार के केंचुए पाए जाते हैं। इसलिए स्थानीय मिट्टी में केंचुओं की स्थानीय प्रजाति का चयन कृमि खाद के लिए अत्यंत उपयोगी कदम है। किसी अन्य स्थानों से केंचुआ लाये जाने की जरूरत नहीं है। भारत में सामान्यतौर पर जिन स्थानीय प्रजाति के केंचुओं का उपयोग किया जाता है उनके नाम पेरियोनिक्स एक्सकैवेटस एवं लैम्पिटो मौरिटी है। इन केंचुओं को पाला जा सकता है या फिर इसे गड्ढों, टोकरी, तालाबों, कंक्रीट के बने नाद घर या किसी कंटेनर में सामान्य पद्धति से कृमि खाद बनाने में उपयोग में लाया जा सकता है।
स्थानीय केंचुओं को संग्रहित करने की विधि -
1.मिट्टी की सतह पर दिखाई पड़ने वाले कृमि के आधार पर केंचुआ युक्त मिट्टी की पहचान करना
2.500 ग्राम गुड़ एवं 500 ग्राम ताजे पशु गोबर को दो लीटर पानी में घोलें तथा 1 मीटर X 1 मीटर के क्षेत्र पर उसका छिड़काव करें
3.भूसे या धान की पुआल या पुराने थैले से उसे ढ़क दें
4.20 से 30 दिनों तक उसपर पानी का छिड़काव करें
5.पश्च प्रजनन और प्राचीन स्थानीय कृमियों का समूह उस स्थान पर एकत्रित हो जाता है जिसे जमा कर उपयोग में लाया जा सकता है
कृमि खाद गड्ढे का निर्माण
कृमि खाद गड्ढे को किसी भी सुविधाजनक स्थान या घर के पिछवाड़े या खेत में निर्मित किया जा सकता है। यह किसी भी आकार का ईंट से निर्मित और उचित जल निकासी युक्त, एक गड्ढे वाला या दो गड्ढे वाला या टैंक हो सकता है। 2 मीटर X 1 मीटर X 0.75 मीटर के आकार वाले कक्ष या गड्ढे की आसानी से देखभाल की जा सकती है। जैव पदार्थ और कृषि अपशिष्ट की मात्रा के आधार पर गड्ढों और चैम्बर्स के आकार को निर्धारित किया जा सकता है। कृमि को चीटियों के हमले से बचाने के लिए कृमि गड्ढे की पैरापेट दीवार के केन्द्र में जल-खाना का होना जरूरी है।
चार कक्ष वाला टैंक/गड्ढा पद्धति
कृमि खाद गड्ढे निर्माण की चार कक्ष वाली पद्धति, केंचुओं को पूर्ण गोबर युक्त पदार्थ वाले एक कक्ष से पूर्व प्रसंस्कृत अपशिष्ट वाले दूसरे चैम्बर में आसानी से आवाजाही की सुविधा प्रदान करता है।
कृमि सतह का निर्माण
•लगभग 15 से 20 सेंमी मोटी कृमि सतह बेहतर, आर्द्र व नरम मिट्टी युक्त वास्तविक सतह होता है जो निचले स्तर पर स्थित होता है। यह ईंट के चूर्ण और बालू के 5 सेंमी वाले पतले सतह के ऊपर स्थित होता है।
•केंचुआ को गीली मिट्टी में रखा जाता जहाँ वह अपने आवास के रूप में रहता है। 15 से 20 सेंमी वाले मोटे कृमि बेड के साथ 2 सेंमी X 1 सेंमी X 0.75 सेंमी आकार के खाद गड्ढे में 150 केंचुओं को रखा जाता है।
•कृमि बेड के ऊपर यादृच्छिक रूप में ताजे गोबर का लेप लगाया जाता है। खाद के गड्ढे को सूखी हुई पत्तियों विशेषकर बड़े पत्ते, पुआल या कृषि जैव/अपशिष्ट पदार्थों से 5 सेंमी की ऊँचाई तक ढक दिया जाता है। अगले तीस दिनों तक गड्ढे को नम रखने के लिए उसपर नियमित रूप से पानी का छिड़काव किया जाता है।
•बेड न तो सूखी होनी चाहिए न ही नम। गड्ढे को नारियल या खजूर के पत्तों या पुराने जूट की बोड़ी से ढका जाना चाहिए ताकि पक्षियों से उनकी रक्षा की जा सके।
•प्लास्टिक शीट को बेड पर न बिछाया जाए क्योंकि वे गर्मी ग्रहण करते हैं। पहले 30 दिनों के बाद पशुओं का गीला गोबर या रसोई, होटेल या होस्टल से निकला कचरा, राख या या कृषि अपशिष्ट को लगभग 5 सेंमी की मोटाई तक छीटें। इसे हफ्ते में दो बार दोहराया जाए।
•सभी कार्बनिक अपशिष्ट को कुदाली की सहायता से समय-समय पर ऊपर-नीचे किया जाए या मिलाया जाए।
•गड्ढे में उचित मात्रा में आर्द्रता बनाए रखने के लिए नियमित रूप से जल का छिड़काव किया जाए। यदि मौसम बहुत अधिक शुष्क हो तो बार-बार पानी देकर गीला बनाए रखना चाहिए।
खाद के तैयार होने का समय
1.जब सामग्री पूरी तरह से मुलायम या चूर्ण बन जाती है और खाद का रंग भूरा हो जाता है तब खाद बनकर तैयार हो जाता है। यह काले रंग का दानेदार, हल्का वज़नी और उर्वरा शक्ति से युक्त होता है।
2.गड्ढे के आकार के आधार पर बेड के ऊपरी सिरे पर निर्धारित मात्रा में कृमि की उपस्थिति में 60 से 90 दिनों के भीतर कृमि खाद तैयार हो जाना चाहिए। इसके बाद कृमि खाद को गड्ढे से निकालकर उपयोग में लाया जा सकता है।
3.खाद से कृमियों को अलग करने के लिए नियत समय से दो या तीन दिन पहले पानी का छिड़काव बंद कर दें, उसके बाद बेड को खाली करें। ऐसा करने से 80 प्रतिशत तक कृमि बेड के निचली सतह पर जा बैठेते हैं।
4.कृमियों को चलनी का उपयोग कर अलग किया जा सकता है। केंचुए और गाढ़े पदार्थ जो चलनी के ऊपरी भाग में बने रहते हैं वे फिर बिन में वापस जाते और प्रक्रिया फिर से शुरू हो जाती है। खाद की गंध सोंधी होगी। यदि खाद से गंदी बदबू आ रही हो तो इसका मतलब है कि खमीर की प्रक्रिया उसके अंतिम चरण तक नहीं पहुँची है और जीवाणु संबंधित प्रक्रिया अभी भी जारी है। मटमैली बदबू आने का मतलब है कि खमीर की उपस्थिति या अत्यधिक गर्मी के कारण नाईट्रोजन की कमी हो जाती है। ऐसी स्थिति में खाद के ढेर को हवादार बनाए रखने या उसमें फिर से सूखी या कड़ी/ रेशेदार सामग्री मिलाने की प्रक्रिया प्रारंभ करें और ढेर को सूखा बनाए रखें। बोरी में बंद करने से पहले खाद के ढेले को फोड़कर छोटा-छोटा बना लें।
5.संचित सामग्री को धूप में ढ़ेर के रूप में रखें ताकि अधिकाँश कृमि ढ़ेर के निचले ठंडे आधार पर चले जाएँ।
6.दो या चार गड्ढे वाले पद्धति में, प्रथम चैम्बर में पानी डालना बंद कर दें ताकि कृमि स्वयं दूसरे चैम्बर में चले जाएँ। जहाँ कृमि के लिए अनुकूल वातावरण चक्रीय तरीके से बनाई रखी जाती है और चक्रीय आधार पर लगातार केचुएँ भी प्राप्त की जा सकेगी।
कृमि खाद के लाभ
• केंचुओं द्वारा कार्बनिक अपशिष्ट को शीघ्रता से तोड़कर टुकड़ों में विभाजित किया जा सकता है जो एक बेहतर संरचना में गैर विषैली पदार्थ के रूप में बदल जाता है। उसका उच्च आर्थिक मूल्य होता है, साथ ही, वह पौधों की वृद्धि में मृदा शीतक (स्वायल कंडिशनर) का कार्य भी करता है।
• कृमि खाद भूमि को उपयुक्त खनिज संतुलन प्रदान करता है तथा उसकी ऊर्वरा शक्ति में सुधार करता।
• कृमि खाद बड़े पैमाने पर रोगमूलक सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या को कम करता है और इस नजरिए से यह कूड़ा-करकट से अलग नहीं है।
• कृमि खाद अपने निष्पादन के दौरान पर्यावरणात्मक समस्याओं को भी कम करता है।
• ऐसा माना जाता है कि कृमि खाद समाज के गरीब और पिछड़े समुदाय के लिए कुटीर उद्योग का कार्य कर सकता है जो उन्हें दोहरा लाभ दिला सकता।
• यदि प्रत्येक गाँव के बेरोजगार युवक/महिला समूहों की सहकारी समिति बनाकर कृमि खाद का उत्पादन कर प्रस्तावित दर पर ग्रामीणों के बीच बिक्री की जाए तो यह एक समझदारीभरा संयुक्त उद्यम का रूप ले सकता है। इससे युवा वर्ग न केवल धन अर्जित कर सकेंगे अपितु सुस्थिर कृषि पद्धतियों के लिए उत्कृष्ट गुणपरक कार्बनिक खाद प्रदान कर समाज की मदद भी कर सकेंगे।
Wednesday, February 3, 2010
मधुमक्खी पालन
मधुमक्खी पालन एक कृषि आधारित उद्यम है, जिसे किसान अतिरिक्त आय अर्जित करने के लिए अपना सकते हैं।
मधुमक्खियां फूलों के रस को शहद में बदल देती हैं और उन्हें अपने छत्तों में जमा करती हैं। जंगलों से मधु एकत्र करने की परंपरा लंबे समय से लुप्त हो रही है। बाजार में शहद और इसके उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण मधुमक्खी पालन अब एक लाभदायक और आकर्षक उद्यम के रूप में स्थापित हो चला है। मधुमक्खी पालन के उत्पाद के रूप में शहद और मोम आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
आय बढ़ाने की गतिविधि के रूप में मधुमक्खी पालन के लाभ
• मधुमक्खी पालन में कम समय, क म लागत और कम ढांचागत पूंजी निवेश की जरूरत होती है,
• कम उपजवाले खेत से भी शहद और मधुमक्खी के मोम का उत्पादन किया जा सकता है,
• मधुमक्खियां खेती के किसी अन्य उद्यम से कोई ढांचागत प्रतिस्पर्द्धा नहीं करती हैं,
• मधुमक्खी पालन का पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मधुमक्खियां कई फूलवाले पौधों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस तरह वे सूर्यमुखी और विभिन्न फलों की उत्पादन मात्रा बढ़ाने में सहायक होती हैं,
•शहद एक स्वादिष्ट और पोषक खाद्य पदार्थ है। शहद एकत्र करने के पारंपरिक तरीके में मधुमक्खियों के जंगली छत्ते नष्ट कर दिये जाते हैं। इसे मधुमक्खियों को बक्सों में रख कर और घर में शहद उत्पादन कर रोका जा सकता है,
•मधुमक्खी पालन किसी एक व्यक्ति या समूह द्वारा शुरू किया जा सकता है,
•बाजार में शहद और मोम की भारी मांग है।
उत्पादन प्रक्रिया
मधुमक्खियां खेत या घर में बक्सों में पाली जा सकती हैं।

छत्ता: यह एक साधारण लंबा बक्सा होता है, जिसे ऊपर से कई छड़ों से ढंका जाता है। बक्से का आकार 100 सेंटीमीटर लंबा, 45 सेंटीमीटर चौड़ा और 25 सेंटीमीटर ऊंचा होता है। बक्सा दो सेंटीमीटर मोटा होना चाहिए और उसके भीतर छत्ते को चिपका कर एक सेंटीमीटर के छेद का प्रवेश द्वार बनाया जाना चाहिए। ऊपर की छड़ बक्से की चौड़ाई के बराबर लंबी होनी चाहिए और उसे करीब 1.5 सेंटीमीटर मोटी होनी चाहिए। इतनी मोटी छड़ एक भारी छत्ते को टांगने के लिए पर्याप्त है। दो छड़ों के बीच 3.3 सेंटीमीटर की खाली जगह होनी चाहिए, ताकि मधुमक्खियों को प्राकृतिक रूप में खाली जगह मिले और वे नया छत्ता बना सकें।
• स्मोकर या धुआं फेंकनेवाला: यह दूसरा महत्वपूर्ण उपकरण है। इसे छोटे टिन से बनाया जा सकता है। हम धुआं फेंकनेवाले का उपयोग खुद को मधुमक्खियों के डंक से बचाने और उन पर नियंत्रण पाने के लिए करते हैं।
• कपड़ा: काम के दौरान अपनी आंखों और नाक को मधुमक्खियों के डंक से बचाने के लिए।
• छुरी: इसका इस्तेमाल उपरी छड़ों को ढीला करने और शहद की छड़ों को काटने के लिए किया जाता है।
• पंख: मधुमक्खियों को छत्ते से हटाने के लिए।
• रानी को छोड़नेवाला
• माचिस की डिब्बी
मधुमक्खियों की प्रजातियां
भारत में मधुमक्खियों की चार प्रजातियां पायी जाती हैं। ये हैं:
• पहाड़ी मधुमक्खी (एपिस डोरसाटा): ये अच्छी मात्रा में शहद एकत्र करनेवाली होती हैं। इनकी एक कॉलोनी से 50 से 80 किलो तक शहद मिलता है।
• छोटी मधुमक्खी (एपिस फ्लोरिया): इनसे बहुत कम शहद मिलता है। एक कॉलोनी से मात्र 200 से 900 ग्राम शहद ही ये एकत्र करती हैं।
• भारतीय मधुमक्खी (एपिस सेराना इंडिका): ये एक साल में एक कॉलोनी से औसतन छह से आठ किलो तक शहद देती हैं।
• यूरोपियन मधुमक्खी (इटालियन मधुमक्खी)(एपिस मेल्लीफेरा): इनकी एक कॉलोनी से औसतन 25 से 40 किलो तक शहद मिलता है।
डंकहीन मधुमक्खी (ट्राइगोना इरीडीपेन्निस): उपरोक्त के अलावा केरल में एक और प्रजाति है, जिसे डंकहीन मधुमक्खी कहा जाता है। इनके डंक अल्पविकसित होते हैं। ये परागण की विशेषज्ञ होती हैं। ये हर साल 300 से 400 ग्राम शहद उत्पादित करती हैं।

छत्तों की स्थापना
• सभी बक्से खुली और सूखी जगहों पर होने चाहिए। यदि यह स्थान किसी बगीचे के आसपास हो तो और भी अच्छा होगा। बगीचे में पराग, रस और पानी का पर्याप्त स्रोत हो।
• छत्तों का तापमान उपयुक्त बनाये रखने के लिए इन्हें सूर्य की किरणों से बचाया जाना जरूरी होता है।
• छत्तों के आसपास चींटियों के लिए कुआं होना चाहिए। कॉलोनियों का रुख पूर्व की ओर हो और बारिश और सूर्य से बचाने के लिए इसकी दिशा में थोड़ा बहुत बदलाव किया जा सकता है।
• कॉलोनियों को मवेशियों, अन्य जानवरों, व्यस्त सड़कों और सड़क पर लगी लाइटों से दूर रखें।
मधुमक्खियों की कॉलोनी की स्थापना
• मधुमक्खी कॉलोनी की स्थापना के लिए मधुमक्खी किसी जंगली छत्तों की कॉलोनी से लेकर उसे छत्ते में स्थानांतरित किया जा सकता है या फिर उधर से गुजरनेवाली मधुमक्खियों के झुंड को आकर्षित किया जा सकता है।
• किसी तैयार छत्ते में मधुमक्खियों के झुंड को आकर्षित करने या स्थानांतरित करने से पहले उस बक्से में परिचित सुगंध देना लाभदायक होता है। इसके लिए बक्से के भीतर छत्तों के टुकड़ों को रगड़ दें या थोड़ा सा मोम लगा दें। यदि संभव हो, तो किसी प्राकृतिक ठिकाने से रानी मक्खी को पकड़ लें और उसे अपने छत्ते में रख दें, ताकि दूसरी मधुमक्खियां वहां आकर्षित हों।
• छत्ते में जमा की गयी मधुमक्खियों को कुछ सप्ताह के लिए भोजन करायें। इसके लिए आधा कप चीनी को आधा कप गरम पानी में अच्छी तरह घोल लें और उसे बक्से में रख दें। इससे छड़ के साथ तेजी से छत्ता बनाने में भी मदद मिलेगी।
• बक्से में भीड़ करने से बचें।
कॉलोनियों का प्रबंधन
• मधुमक्खी के छत्तों का शहद टपकने के मौसम में, खासकर सुबह के समय सप्ताह में कम से कम एक बार निरीक्षण करें।
• निम्नलिखित क्रम में बक्सों की सफाई करें, छत, ऊपरी सतह, छत्तों की जगह और सतह।
• कॉलोनियों पर नियमित निगाह रखें और देखते रहें कि स्वस्थ रानी, छत्ते का विकास, शहद का भंडारण, पराग कण की मौजूदगी, रानी का घर और मधुमक्खियों की संख्या तथा छत्तों के कोष्ठों का विकास हो रहा है।
• इनमें से मधुमक्खियों के किसी एक दुश्मन के संक्रमण की भी नियमित जांच करें-
• मोम का कीड़ा (गैल्लेरिया मेल्लोनेल्ला): इसके लार्वा और सिल्कनुमा कीड़ों को छत्ते से, बक्सों के कोनों से और छत से साफ कर दें।
• मोम छेदक (प्लैटिबोलियम एसपी): वयस्क छेदकों को एकत्र कर नष्ट कर दें।
• दीमक: फ्रेम और सतह को रुई से साफ करें। रुई को पोटाशियम परमैंगनेट के घोल में डुबायें। जब तक दीमक खत्म न हो जाये, सतह को पोछते रहें।
•नरम मौसम में प्रबंधन
•छड़ों को हटा दें और उपलब्ध स्वस्थ मधुमक्खियों को अच्छी तरह से कोष्ठकों में रखें।
•यदि संभव हो, तो विभाजक दीवार लगा दें।
•यदि पता चल जाये, तो रानी के घर और शिशुओं के घर को नष्ट कर दें।
•भारतीय मधुमक्खियों के लिए प्रति सप्ताह 200 ग्राम चीनी का घोल (एक-एक के अनुपात में) दें।
•पूरी कॉलोनी को एक ही समय में भोजन दें, ताकि लूटपाट न हो।
•शहद एकत्र करने के मौसम में प्रबंधन
•शहद एकत्र करने का मौसम शुरू होने से पहले कॉलोनी में मधुमक्खियों की संख्या पर्याप्त बढ़ा लें।
•पहले छत्ते और नये कोष्ठों के बीच पर्याप्त जगह दें, ताकि रानी मधुमक्खी अपने कोष्ठ में रह सके।
•रानी मधुमक्खी को उसके कोष्ठ में बंद करने के लिए रानी को अलग करनेवाली दीवार लगा दें।
•कॉलोनी का सप्ताह में एक बार निरीक्षण करें और बक्से के किनारे शहद से भरे छत्तों को तत्काल हटा दें। इससे बक्सा हल्का होता रहेगा और तीन-चौथाई भरे हुए शहद के बरतन को समय-समय पर खाली करना जगह भी बचायेगा।
•जिस छत्ते को पूरी तरह बंद कर दिया गया हो या शहद निकालने के लिए बाहर निकाला गया हो, उसे बाद में वापस पुराने स्थान पर लगा दिया जाना चाहिए।
शहद एकत्र करना
•मधुमक्खियों को धुआं दिखा कर अलग कर दें और सावधानी से छत्तों को छड़ से अलग करें।
•शहद को अमूमन अक्तूबर-नवंबर और फरवरी-जून के बीच ही एकत्र किया जाना चाहिए, क्योंकि इस मौसम में फूल ज्यादा खिलते हैं।
•पूरी तरह भरा हुआ छत्ता हल्के रंग का होता है। इसके दोनों ओर के आधे से अधिक कोष्ठ मोम से बंद होते हैं।
मधुमक्खियां फूलों के रस को शहद में बदल देती हैं और उन्हें अपने छत्तों में जमा करती हैं। जंगलों से मधु एकत्र करने की परंपरा लंबे समय से लुप्त हो रही है। बाजार में शहद और इसके उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण मधुमक्खी पालन अब एक लाभदायक और आकर्षक उद्यम के रूप में स्थापित हो चला है। मधुमक्खी पालन के उत्पाद के रूप में शहद और मोम आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
आय बढ़ाने की गतिविधि के रूप में मधुमक्खी पालन के लाभ
• मधुमक्खी पालन में कम समय, क म लागत और कम ढांचागत पूंजी निवेश की जरूरत होती है,
• कम उपजवाले खेत से भी शहद और मधुमक्खी के मोम का उत्पादन किया जा सकता है,
• मधुमक्खियां खेती के किसी अन्य उद्यम से कोई ढांचागत प्रतिस्पर्द्धा नहीं करती हैं,
• मधुमक्खी पालन का पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मधुमक्खियां कई फूलवाले पौधों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस तरह वे सूर्यमुखी और विभिन्न फलों की उत्पादन मात्रा बढ़ाने में सहायक होती हैं,
•शहद एक स्वादिष्ट और पोषक खाद्य पदार्थ है। शहद एकत्र करने के पारंपरिक तरीके में मधुमक्खियों के जंगली छत्ते नष्ट कर दिये जाते हैं। इसे मधुमक्खियों को बक्सों में रख कर और घर में शहद उत्पादन कर रोका जा सकता है,
•मधुमक्खी पालन किसी एक व्यक्ति या समूह द्वारा शुरू किया जा सकता है,
•बाजार में शहद और मोम की भारी मांग है।
उत्पादन प्रक्रिया
मधुमक्खियां खेत या घर में बक्सों में पाली जा सकती हैं।

छत्ता: यह एक साधारण लंबा बक्सा होता है, जिसे ऊपर से कई छड़ों से ढंका जाता है। बक्से का आकार 100 सेंटीमीटर लंबा, 45 सेंटीमीटर चौड़ा और 25 सेंटीमीटर ऊंचा होता है। बक्सा दो सेंटीमीटर मोटा होना चाहिए और उसके भीतर छत्ते को चिपका कर एक सेंटीमीटर के छेद का प्रवेश द्वार बनाया जाना चाहिए। ऊपर की छड़ बक्से की चौड़ाई के बराबर लंबी होनी चाहिए और उसे करीब 1.5 सेंटीमीटर मोटी होनी चाहिए। इतनी मोटी छड़ एक भारी छत्ते को टांगने के लिए पर्याप्त है। दो छड़ों के बीच 3.3 सेंटीमीटर की खाली जगह होनी चाहिए, ताकि मधुमक्खियों को प्राकृतिक रूप में खाली जगह मिले और वे नया छत्ता बना सकें।
• स्मोकर या धुआं फेंकनेवाला: यह दूसरा महत्वपूर्ण उपकरण है। इसे छोटे टिन से बनाया जा सकता है। हम धुआं फेंकनेवाले का उपयोग खुद को मधुमक्खियों के डंक से बचाने और उन पर नियंत्रण पाने के लिए करते हैं।
• कपड़ा: काम के दौरान अपनी आंखों और नाक को मधुमक्खियों के डंक से बचाने के लिए।
• छुरी: इसका इस्तेमाल उपरी छड़ों को ढीला करने और शहद की छड़ों को काटने के लिए किया जाता है।
• पंख: मधुमक्खियों को छत्ते से हटाने के लिए।
• रानी को छोड़नेवाला
• माचिस की डिब्बी
मधुमक्खियों की प्रजातियां
भारत में मधुमक्खियों की चार प्रजातियां पायी जाती हैं। ये हैं:
• पहाड़ी मधुमक्खी (एपिस डोरसाटा): ये अच्छी मात्रा में शहद एकत्र करनेवाली होती हैं। इनकी एक कॉलोनी से 50 से 80 किलो तक शहद मिलता है।
• छोटी मधुमक्खी (एपिस फ्लोरिया): इनसे बहुत कम शहद मिलता है। एक कॉलोनी से मात्र 200 से 900 ग्राम शहद ही ये एकत्र करती हैं।
• भारतीय मधुमक्खी (एपिस सेराना इंडिका): ये एक साल में एक कॉलोनी से औसतन छह से आठ किलो तक शहद देती हैं।
• यूरोपियन मधुमक्खी (इटालियन मधुमक्खी)(एपिस मेल्लीफेरा): इनकी एक कॉलोनी से औसतन 25 से 40 किलो तक शहद मिलता है।
डंकहीन मधुमक्खी (ट्राइगोना इरीडीपेन्निस): उपरोक्त के अलावा केरल में एक और प्रजाति है, जिसे डंकहीन मधुमक्खी कहा जाता है। इनके डंक अल्पविकसित होते हैं। ये परागण की विशेषज्ञ होती हैं। ये हर साल 300 से 400 ग्राम शहद उत्पादित करती हैं।

छत्तों की स्थापना
• सभी बक्से खुली और सूखी जगहों पर होने चाहिए। यदि यह स्थान किसी बगीचे के आसपास हो तो और भी अच्छा होगा। बगीचे में पराग, रस और पानी का पर्याप्त स्रोत हो।
• छत्तों का तापमान उपयुक्त बनाये रखने के लिए इन्हें सूर्य की किरणों से बचाया जाना जरूरी होता है।
• छत्तों के आसपास चींटियों के लिए कुआं होना चाहिए। कॉलोनियों का रुख पूर्व की ओर हो और बारिश और सूर्य से बचाने के लिए इसकी दिशा में थोड़ा बहुत बदलाव किया जा सकता है।
• कॉलोनियों को मवेशियों, अन्य जानवरों, व्यस्त सड़कों और सड़क पर लगी लाइटों से दूर रखें।
मधुमक्खियों की कॉलोनी की स्थापना
• मधुमक्खी कॉलोनी की स्थापना के लिए मधुमक्खी किसी जंगली छत्तों की कॉलोनी से लेकर उसे छत्ते में स्थानांतरित किया जा सकता है या फिर उधर से गुजरनेवाली मधुमक्खियों के झुंड को आकर्षित किया जा सकता है।
• किसी तैयार छत्ते में मधुमक्खियों के झुंड को आकर्षित करने या स्थानांतरित करने से पहले उस बक्से में परिचित सुगंध देना लाभदायक होता है। इसके लिए बक्से के भीतर छत्तों के टुकड़ों को रगड़ दें या थोड़ा सा मोम लगा दें। यदि संभव हो, तो किसी प्राकृतिक ठिकाने से रानी मक्खी को पकड़ लें और उसे अपने छत्ते में रख दें, ताकि दूसरी मधुमक्खियां वहां आकर्षित हों।
• छत्ते में जमा की गयी मधुमक्खियों को कुछ सप्ताह के लिए भोजन करायें। इसके लिए आधा कप चीनी को आधा कप गरम पानी में अच्छी तरह घोल लें और उसे बक्से में रख दें। इससे छड़ के साथ तेजी से छत्ता बनाने में भी मदद मिलेगी।
• बक्से में भीड़ करने से बचें।
कॉलोनियों का प्रबंधन
• मधुमक्खी के छत्तों का शहद टपकने के मौसम में, खासकर सुबह के समय सप्ताह में कम से कम एक बार निरीक्षण करें।
• निम्नलिखित क्रम में बक्सों की सफाई करें, छत, ऊपरी सतह, छत्तों की जगह और सतह।
• कॉलोनियों पर नियमित निगाह रखें और देखते रहें कि स्वस्थ रानी, छत्ते का विकास, शहद का भंडारण, पराग कण की मौजूदगी, रानी का घर और मधुमक्खियों की संख्या तथा छत्तों के कोष्ठों का विकास हो रहा है।
• इनमें से मधुमक्खियों के किसी एक दुश्मन के संक्रमण की भी नियमित जांच करें-
• मोम का कीड़ा (गैल्लेरिया मेल्लोनेल्ला): इसके लार्वा और सिल्कनुमा कीड़ों को छत्ते से, बक्सों के कोनों से और छत से साफ कर दें।
• मोम छेदक (प्लैटिबोलियम एसपी): वयस्क छेदकों को एकत्र कर नष्ट कर दें।
• दीमक: फ्रेम और सतह को रुई से साफ करें। रुई को पोटाशियम परमैंगनेट के घोल में डुबायें। जब तक दीमक खत्म न हो जाये, सतह को पोछते रहें।
•नरम मौसम में प्रबंधन
•छड़ों को हटा दें और उपलब्ध स्वस्थ मधुमक्खियों को अच्छी तरह से कोष्ठकों में रखें।
•यदि संभव हो, तो विभाजक दीवार लगा दें।
•यदि पता चल जाये, तो रानी के घर और शिशुओं के घर को नष्ट कर दें।
•भारतीय मधुमक्खियों के लिए प्रति सप्ताह 200 ग्राम चीनी का घोल (एक-एक के अनुपात में) दें।
•पूरी कॉलोनी को एक ही समय में भोजन दें, ताकि लूटपाट न हो।
•शहद एकत्र करने के मौसम में प्रबंधन
•शहद एकत्र करने का मौसम शुरू होने से पहले कॉलोनी में मधुमक्खियों की संख्या पर्याप्त बढ़ा लें।
•पहले छत्ते और नये कोष्ठों के बीच पर्याप्त जगह दें, ताकि रानी मधुमक्खी अपने कोष्ठ में रह सके।
•रानी मधुमक्खी को उसके कोष्ठ में बंद करने के लिए रानी को अलग करनेवाली दीवार लगा दें।
•कॉलोनी का सप्ताह में एक बार निरीक्षण करें और बक्से के किनारे शहद से भरे छत्तों को तत्काल हटा दें। इससे बक्सा हल्का होता रहेगा और तीन-चौथाई भरे हुए शहद के बरतन को समय-समय पर खाली करना जगह भी बचायेगा।
•जिस छत्ते को पूरी तरह बंद कर दिया गया हो या शहद निकालने के लिए बाहर निकाला गया हो, उसे बाद में वापस पुराने स्थान पर लगा दिया जाना चाहिए।
शहद एकत्र करना
•मधुमक्खियों को धुआं दिखा कर अलग कर दें और सावधानी से छत्तों को छड़ से अलग करें।
•शहद को अमूमन अक्तूबर-नवंबर और फरवरी-जून के बीच ही एकत्र किया जाना चाहिए, क्योंकि इस मौसम में फूल ज्यादा खिलते हैं।
•पूरी तरह भरा हुआ छत्ता हल्के रंग का होता है। इसके दोनों ओर के आधे से अधिक कोष्ठ मोम से बंद होते हैं।
ड्रिप सिंचाई प्रणाली
ड्रिप सिंचाई प्रणाली
ड्रिप सिंचाई प्रणाली फसल को मुख्य पंक्ति, उप पंक्ति तथा पार्श्व पंक्ति के तंत्र के उनकी लंबाईयों के अंतराल के साथ उत्सर्जन बिन्दु का उपयोग करके पानी वितरित करती है। प्रत्येक ड्रिपर/उत्सर्जक, मुहाना संयत, पानी व पोषक तत्वों तथा अन्य वृद्धि के लिये आवश्यक पद्धार्थों की विधिपूर्वक नियंत्रित कर एक समान निर्धारित मात्रा, सीधे पौधे की जड़ों में आपूर्ति करता है।
पानी और पोषक तत्व उत्सर्जक से, पौधों की जड़ क्षेत्र में से चलते हुए गुरुत्वाकर्षण और केशिका के संयुक्त बलों के माध्यम से मिट्टी में जाते हैं। इस प्रकार, पौधों की नमी और पोषक तत्वों की कमी को तुरंत ही पुन: प्राप्त किया जा सकता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि पौधे में पानी की कमी नहीं होगी, इस प्रकार गुणवत्ता, उसके इष्टतम विकास की क्षमता तथा उच्च पैदावार को बढ़ाता है।
मॉडल ड्रिप सिंचाई प्रणाली का डिजाइन

ड्रिप सिंचाई आज की जरूरत है, क्योंकि प्रकृति की ओर से मानव जाति को उपहार के रूप में मिली जल असीमित एवं मुफ्त रूप से उपलब्ध नहीं है। विश्व जल संसाधनो में तेजी से ह्रास हो रहा है।
ड्रिप सिंचाई प्रणाली के लाभ
• पैदावार में 150 प्रतिशत तक वृद्धि
• बाढ़ सिंचाई की तुलना में 70 प्रतिशत तक पानी की बचत। अधिक भूमि को इस तरह बचाये गये पानी के साथ सिंचित किया जा सकता है।
• फसल लगातार,स्वस्थ रूप से बढ़ती है और जल्दी परिपक्व होती है।
• शीघ्र परिपक्वता से उच्च और तेजी से निवेश की वापसी प्राप्त होती है।
• उर्वरक उपयोग की क्षमता 30 प्रतिशत बढ़ जाती है।
• उर्वरक, अंतर संवर्धन और श्रम का मूल्य कम हो जाता है।
• उर्वरक लघु सिंचाई प्रणाली के माध्यम से और रसायन उपचार दिया जा सकता है।
• बंजर क्षेत्र,नमकीन, रेतीली एवं पहाड़ी भूमि भी उपजाऊ खेती के अधीन लाया जा सकता है।
ड्रिप सिंचाई प्रणाली फसल को मुख्य पंक्ति, उप पंक्ति तथा पार्श्व पंक्ति के तंत्र के उनकी लंबाईयों के अंतराल के साथ उत्सर्जन बिन्दु का उपयोग करके पानी वितरित करती है। प्रत्येक ड्रिपर/उत्सर्जक, मुहाना संयत, पानी व पोषक तत्वों तथा अन्य वृद्धि के लिये आवश्यक पद्धार्थों की विधिपूर्वक नियंत्रित कर एक समान निर्धारित मात्रा, सीधे पौधे की जड़ों में आपूर्ति करता है।
पानी और पोषक तत्व उत्सर्जक से, पौधों की जड़ क्षेत्र में से चलते हुए गुरुत्वाकर्षण और केशिका के संयुक्त बलों के माध्यम से मिट्टी में जाते हैं। इस प्रकार, पौधों की नमी और पोषक तत्वों की कमी को तुरंत ही पुन: प्राप्त किया जा सकता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि पौधे में पानी की कमी नहीं होगी, इस प्रकार गुणवत्ता, उसके इष्टतम विकास की क्षमता तथा उच्च पैदावार को बढ़ाता है।
मॉडल ड्रिप सिंचाई प्रणाली का डिजाइन

ड्रिप सिंचाई आज की जरूरत है, क्योंकि प्रकृति की ओर से मानव जाति को उपहार के रूप में मिली जल असीमित एवं मुफ्त रूप से उपलब्ध नहीं है। विश्व जल संसाधनो में तेजी से ह्रास हो रहा है।
ड्रिप सिंचाई प्रणाली के लाभ
• पैदावार में 150 प्रतिशत तक वृद्धि
• बाढ़ सिंचाई की तुलना में 70 प्रतिशत तक पानी की बचत। अधिक भूमि को इस तरह बचाये गये पानी के साथ सिंचित किया जा सकता है।
• फसल लगातार,स्वस्थ रूप से बढ़ती है और जल्दी परिपक्व होती है।
• शीघ्र परिपक्वता से उच्च और तेजी से निवेश की वापसी प्राप्त होती है।
• उर्वरक उपयोग की क्षमता 30 प्रतिशत बढ़ जाती है।
• उर्वरक, अंतर संवर्धन और श्रम का मूल्य कम हो जाता है।
• उर्वरक लघु सिंचाई प्रणाली के माध्यम से और रसायन उपचार दिया जा सकता है।
• बंजर क्षेत्र,नमकीन, रेतीली एवं पहाड़ी भूमि भी उपजाऊ खेती के अधीन लाया जा सकता है।
Friday, January 22, 2010
organic farming
Organic farming is a production system of crops which avoids the use of synthetic and chemical inputslike fertilizers, pesticides, growth regulators and livestock feed additives. Organic farming systems depend mainly on crop rotation, crop residues, animal manures, legumes, green manures, off-farm organic residues, mineral bearing rocks. natural pesticides and biological pest control to maintain soil productivity and supply important nutrients like N, P, K. Indiscriminate use of chemical fertilizers for decades has resulted in the decline of organic matter content of soils to less than one per cent. The use of pesticides has led to pest resurgence and difficulty in controlling weeds. Indiscriminate use of artificial fertilizer and pesticide has caused severe water and environmental pollution. The residue of chemical is of seriousconcern for the safety of food and sustainable production. Organic farming ensures the production of palatable food free from chemical residues.
Organic farming is a system approach utilizing the natural cycles and biological
Organic farming is a system approach utilizing the natural cycles and biological
"Tropical Dairy Farming: Feeding Management for Small Holder Dairy Farmers in the Humid Tropics"
John Moran, "Tropical Dairy Farming: Feeding Management for Small Holder Dairy Farmers in the Humid Tropics"
CSIRO Publishing (December 2005) | English | 0643091238 | 312 pages | PDF | 5.00 MB
This manual is designed for use by dairy production advisors working in tropical areas, especially in South-East Asia. It aims to increase the productivity of small holder dairy farmers in the humid tropics by improving the feeding management of their livestock. It shows how to provide dairy cows with cost-effective feeds that match small holder farming systems and discusses the major obstacles to improving feeding management in the humid tropics. The author shows the benefits and drawbacks of various feed components and the calculation of balanced diets based mainly on forages combined with some supplementary feeding. Diseases and problems associated with unbalanced diets are also covered, as well as important information on growing and conserving quality forages as silage. Tropical Dairy Farming draws on examples from a variety of countries including Indonesia, Malaysia, Thailand, Vietnam, Myanmar and the Philippines.
Links
http://rapidshare.com/files/295676630/0643091238.rar
or
http://depositfiles.com/files/offecuz3z/0643091238.rar
CSIRO Publishing (December 2005) | English | 0643091238 | 312 pages | PDF | 5.00 MB
This manual is designed for use by dairy production advisors working in tropical areas, especially in South-East Asia. It aims to increase the productivity of small holder dairy farmers in the humid tropics by improving the feeding management of their livestock. It shows how to provide dairy cows with cost-effective feeds that match small holder farming systems and discusses the major obstacles to improving feeding management in the humid tropics. The author shows the benefits and drawbacks of various feed components and the calculation of balanced diets based mainly on forages combined with some supplementary feeding. Diseases and problems associated with unbalanced diets are also covered, as well as important information on growing and conserving quality forages as silage. Tropical Dairy Farming draws on examples from a variety of countries including Indonesia, Malaysia, Thailand, Vietnam, Myanmar and the Philippines.
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Good Growing: Why Organic Farming Works (Our Sustainable Future)

Publisher: Bison Books | ISBN: 0803266480 | edition 2005 | PDF | 251 pages | 2,01 mb
Over the past decade, organic products have become the fastest growing sector of agriculture, with an annual increase of at least 20 percent. This book explains why organic production and consumption have seen such phenomenal growth in recent years—and, even more important, why they should. A clear-eyed, close-up look at the compelling reasons for organic farming and the methods that make it work, Good Growing begins with a frank account of the problems with conventional industrial agriculture—the pesticide use, pollution, and corporate control that have undermined public health and devastated rural towns and family farms. In-depth interviews with working organic farmers from across the country bring to life the facts and figures that Leslie Duram sets out in her extensive overview of the realities of organic farming today. Farmers with very different operations in California, Colorado, Illinois, Florida, and upstate New York give us an intimate understanding of the ecological, social, economic, and personal factors that shape their farming experiences. We also learn firsthand about the attractions and pleasures as well as the problems and concerns that accompany organic farming. With its comprehensive view of the status of farming and its compelling portraits of organic farmers, Good Growing is, finally, a work of scientific advocacy describing a course of action, based on the best research available, to improve the health of agriculture in our day.
link;-http://depositfiles.com/en/files/07814q83g
Improving the Safety of Fresh Fruit and Vegetables
Organic Gardening book collection part 1
Different publishers | 50 books | language english, serbian | PDF, djvu | 660 MB

Organic gardening usually refers to gardening practices that do not use chemical pesticides. But it is not so simple.
Gardening organically is really just common sense. Organic gardening doesn't mean you have to surrender your plants to pests and diseases. Organics means you need to know how nature works and stop trying to fight it. The key to organic gardening is keeping a healthy balance in your garden. Prevent problems, rather than treating for them after the fact. Healthy plants are better able to withstand pests than stressed plants. And your plants will be healthy if they are given what they need to grow well and if you are growing diversity of plants.
The Gardener's Weed Book
The Wildlife Garden Planning Backyard Habitats
OrganicSecrets.exe
The.Worm.Book_Nancarrow.Taylor_0898159946.djvu
A Guide to Home-Scale Permaculture(los sken).pdf
BILJNI PREPARATI djubriva.pdf
Creating eco garden.pdf
Epitaph for a pitch.pdf
GardenFormulas.pdf
Gardening Without Irrigation Or Without Much Anyway.pdf
Gardening_With_Woodland.pdf
Good gardens with less water.pdf
Good Growing Why Organic Farming Works.PDF
Greenhouse_Gardener-1980.pdf
hanbook_of_organic_food_safety_.pdf
Handbook of Vegetable Pests.pdf
Heirloom Vegetable Gardening_.pdf
Horticulture__The_Green_World__linuxtrance.pdf
Masanobu Fukuoka - Revolucija jedne slamke.pdf
Medjuusevi u organskoj poljoprivredi.PDF
Niwaki - pruning shaping.pdf
Non chemical weed management .pdf
Organic gardening for Barbados.pdf
Organic gardening univer..pdf
Organic Mari Soma Style.pdf
Organic_Gardening Windsor.pdf
Organska poljoprivreda.PDF
OTPADNA VODA SA FARMI.PDF
Pest managment.pdf
pestmanagement.pdf
-PLODORED.pdf
Practical_Ecology.pdf
Profitable Organic Farming.pdf
Sakupljanje i cuvanje sjemenja.pdf
Secrets of the Soil.pdf
Stories of Ethnic Gardening.pdf
Sustainable soils.pdf
The green world-horticulture.pdf
The One Straw Revolution-Masanobu Fukuoka 1978..pdf
The Organic Gardener's Handbook of Natural Insect and Disease Control...
The Organic Gardener's Insect and Disease Contro(los sken).pdf
The Permaculture Way-Practical Steps to Create a Self-Sustaining World...
Under ground life.pdf
Water wise house and garden.pdf
Water wise.pdf
WILD FLOWERS WORTH KNOWING.pdf
Prirodni fungicidi i insektidcidi.txt
http://rapidshare.com/files/330164922/---__ORGANIC_GARDENING---.part1.rar
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Organic gardening usually refers to gardening practices that do not use chemical pesticides. But it is not so simple.
Gardening organically is really just common sense. Organic gardening doesn't mean you have to surrender your plants to pests and diseases. Organics means you need to know how nature works and stop trying to fight it. The key to organic gardening is keeping a healthy balance in your garden. Prevent problems, rather than treating for them after the fact. Healthy plants are better able to withstand pests than stressed plants. And your plants will be healthy if they are given what they need to grow well and if you are growing diversity of plants.
The Gardener's Weed Book
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BILJNI PREPARATI djubriva.pdf
Creating eco garden.pdf
Epitaph for a pitch.pdf
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Gardening Without Irrigation Or Without Much Anyway.pdf
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Good gardens with less water.pdf
Good Growing Why Organic Farming Works.PDF
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Handbook of Vegetable Pests.pdf
Heirloom Vegetable Gardening_.pdf
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Pest managment.pdf
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Practical_Ecology.pdf
Profitable Organic Farming.pdf
Sakupljanje i cuvanje sjemenja.pdf
Secrets of the Soil.pdf
Stories of Ethnic Gardening.pdf
Sustainable soils.pdf
The green world-horticulture.pdf
The One Straw Revolution-Masanobu Fukuoka 1978..pdf
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The Organic Gardener's Insect and Disease Contro(los sken).pdf
The Permaculture Way-Practical Steps to Create a Self-Sustaining World...
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Water wise house and garden.pdf
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WILD FLOWERS WORTH KNOWING.pdf
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Tropical Flowering Plants: A Guide to Identification and Cultivation
Tropical Flowering Plants: A Guide to Identification and Cultivation
Timber Press | ISBN: 0881925853 | 2003-09-01 | PDF | 424 pages | 45.4 Mb | RS

This book bridges a long-standing gap between obscure references in tropical botany and the gardener's need for an accurate, practical guide with clear photographs. Incorporating the latest advances in plant taxonomy from the definitive text of Dr. Walter Judd, the book is a rare work of scrupulous research --- and magnificent photography --- that will be as useful to the gardener as it is to the botanist. Kirsten Llamas exhaustively documents more than 1400 flowering trees, shrubs, vines, and herbaceous plants commonly grown in tropical and subtropical gardens. She provides thorough information on cultivation for each plant, including growth characteristics, light exposure, cold hardiness, invasive tendencies, and unique horticultural features. More than 1500 color photos of magnificent flowering specimens make this book as much a pleasure to browse as it is a resource for research. Sure to appeal to gardeners, landscapers, nurseries, collectors, botany students, florists, and botanical gardens, Tropical Flowering Plants promises to be a staple reference for decades to come
download from here:-
http://rapidshare.com/files/300243453/tropical_flower_plants.pdf
Timber Press | ISBN: 0881925853 | 2003-09-01 | PDF | 424 pages | 45.4 Mb | RS

This book bridges a long-standing gap between obscure references in tropical botany and the gardener's need for an accurate, practical guide with clear photographs. Incorporating the latest advances in plant taxonomy from the definitive text of Dr. Walter Judd, the book is a rare work of scrupulous research --- and magnificent photography --- that will be as useful to the gardener as it is to the botanist. Kirsten Llamas exhaustively documents more than 1400 flowering trees, shrubs, vines, and herbaceous plants commonly grown in tropical and subtropical gardens. She provides thorough information on cultivation for each plant, including growth characteristics, light exposure, cold hardiness, invasive tendencies, and unique horticultural features. More than 1500 color photos of magnificent flowering specimens make this book as much a pleasure to browse as it is a resource for research. Sure to appeal to gardeners, landscapers, nurseries, collectors, botany students, florists, and botanical gardens, Tropical Flowering Plants promises to be a staple reference for decades to come
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